भारत जैसे देश में जहां सदियों से बेटियों को बोझ समझा जाता रहा हो, वहां “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” जैसी योजना का आना अपने आप में एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन है। 22 जनवरी 2015 को हरियाणा के पानीपत से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस योजना की शुरुआत की थी। इसका मुख्य उद्देश्य लिंग अनुपात को सुधारना, कन्या भ्रूण हत्या को रोकना और बेटियों की शिक्षा व सशक्तिकरण को बढ़ावा देना था। आज दस साल बाद भी यह योजना देश के कोने-कोने में चर्चा का विषय बनी हुई है। BBBP
लिंग अनुपात की विकराल स्थिति BBBP
2011 की जनगणना ने सबको झकझोर कर रख दिया था। देश में प्रति हजार लड़कों पर केवल 918 लड़कियां थीं। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान जैसे राज्यों में यह आंकड़ा 900 से भी नीचे चला गया था। लोग धड़ल्ले से अल्ट्रासाउंड करवाकर बेटियों को गर्भ में ही मार देते थे। पीसी-पीएनडीटी एक्ट होने के बावजूद अवैध गर्भ जांच केंद्र फल-फूल रहे थे। समाज में बेटियों को लेकर घोर नकारात्मक सोच थी। इसी पृष्ठभूमि में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना ने जन्म लिया।
योजना के तीन प्रमुख स्तंभ BBBP
इस योजना को तीन मुख्य आधारों पर खड़ा किया गया है –
पहला, कन्या भ्रूण हत्या और लिंग जांच पर सख्ती से रोक लगाना।
दूसरा, जन्मी बेटियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और पोषण सुनिश्चित करना।
तीसरा, बेटियों की शिक्षा को प्रोत्साहित करना और ड्रॉपआउट दर को कम करना।
इन तीनों मोर्चों पर एक साथ काम करने की रणनीति बनाई गई थी।
जागरूकता अभियान का जादू BBBP
योजना की सबसे बड़ी ताकत इसका व्यापक जागरूकता अभियान रहा। “सेल्फी विद डॉटर” जैसी मुहिम ने लाखों लोगों को जोड़ा। रेडियो, टीवी, अखबार, दीवार लेखन, नुक्कड़ नाटक, स्कूलों में कार्यक्रम – हर जगह बेटी के महत्व को बताया गया। कई राज्यों में “लाडली लक्ष्मी”, “कन्या सुमंगला” जैसी योजनाओं को इससे जोड़ा गया। नतीजा यह हुआ कि लोग बेटियों को लेकर सोचने लगे। बेटी के जन्म पर गांव में ढोल बजने लगा, मिठाई बंटने लगी।
लिंग अनुपात में सुधार के आंकड़े BBBP
सेक्स रेशियो एट बर्थ (SRB) के आंकड़े इस योजना की सफलता की गवाही देते हैं। 2014-15 में जहां यह 918 था, वहीं 2023-24 तक यह 930 के पार पहुंच गया। हरियाणा जैसे राज्य में जहां कभी 775 तक गिर गया था, वहां अब 900 से ऊपर है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब सबमें सुधार दिखा। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। एक पूरी पीढ़ी की सोच बदली है।
शिक्षा में बेटियों का बढ़ता दबदबा BBBP
अभी भी बाकी है लंबी लड़ाई
बेटी पढ़ाओ का नारा सिर्फ नारा नहीं रहा। प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक बेटियों का नामांकन बढ़ा है। आज दसवीं और बारहवीं बोर्ड में लड़कियां लड़कों से आगे हैं। मेडिकल, इंजीनियरिंग, आईएएस जैसी परीक्षाओं में भी बेटियां टॉप कर रही हैं। कई राज्यों में लड़कियों के लिए मुफ्त शिक्षा, साइकिल वितरण, कन्या छात्रावास जैसी योजनाएं चलीं। खेल के क्षेत्र में भी पीवी सिंधु, साइना नेहवाल, मीराबाई चानू जैसी बेटियां देश का नाम रोशन कर रही हैं। BBBP
सुकन्या समृद्धि योजना का योगदान BBBP
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के साथ सबसे मजबूत कड़ी बनी सुकन्या समृद्धि योजना। इसमें बेटी के नाम पर खाता खुलता है, जिसमें 7.6-8% तक ब्याज मिलता है। 21 साल में पैसा दोगुना से ज्यादा हो जाता है। लाखों माता-पिता ने अपनी बेटियों के नाम पर यह खाता खोला। इससे न सिर्फ बचत हुई बल्कि बेटी को बोझ मानने की सोच भी बदली। अब लोग कहते हैं – “हमारी बेटी हमारा बैंक बैलेंस है।”
सच यह भी है कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी बेटियों की शादी जल्दी कर दी जाती है। उच्च शिक्षा में ड्रॉपआउट रेट अभी भी चिंता का विषय है। कुछ राज्यों में लिंग अनुपात अभी भी 900 से नीचे है। घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा जैसी समस्याएं भी कम नहीं हुई हैं। हमें यह समझना होगा कि यह योजना कोई जादू की छड़ी नहीं है, बल्कि एक शुरुआत है। BBBP
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